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रहस्यमयी कुट रचित षड्यंत्र की अनकही कहानी उप वन मंडलाधिकारी कार्यालय सरायपाली पार्ट – 2

सरायपाली। उप वन मंडलाधिकारी सरायपाली से संबंधित शासकीय सेवा भूमि एवं कोटवारी भूमि के कथित हस्तांतरण और पंजीयन को लेकर सवाल लगातार उठ रहे हैं। पूर्व में प्रकाशित समाचार के बाद अब इस मामले में कई नए प्रश्न सामने आए हैं, जिनका जवाब संबंधित विभागीय अधिकारियों और दस्तावेजों की जांच के बाद ही स्पष्ट हो सकेगा।
जानकारी के अनुसार, आरोप है कि सेवा भूमि/कोटवारी भूमि से संबंधित एक जमीन पहले अधिकारी की माता के नाम पर पंजीकृत हुई और बाद में वर्तमान में अधिकारी अथवा उनके परिजनों के नाम से संबंधित होने की बात सामने आई है। हालांकि, इस पूरे मामले में वास्तविक स्वामित्व, हस्तांतरण की प्रक्रिया और वैधानिकता की पुष्टि राजस्व एवं विभागीय अभिलेखों की जांच से होना आवश्यक है।
सबसे बड़ा सवाल यह है कि यदि संबंधित अधिकारी ने शासकीय सेवा में रहते हुए ऐसी संपत्ति का क्रय, हस्तांतरण अथवा अन्य किसी प्रकार का लेन-देन किया, तो क्या इसकी जानकारी विभाग के सक्षम उच्च अधिकारियों को दी गई थी? यदि अनुमति या विभागीय जानकारी दी गई थी, तो वह किस नियम के तहत दी गई और क्या संबंधित दस्तावेजों की जांच की गई थी?
विभागीय जांच की मांग
मामला केवल एक अधिकारी तक सीमित है या विभाग में अन्य कर्मचारियों एवं अधिकारियों द्वारा भी इसी प्रकार की संपत्ति संबंधी कार्रवाई की गई है—यह भी जांच का विषय हो सकता है। इसलिए संबंधित दस्तावेजों, संपत्ति विवरण, पंजीयन अभिलेखों तथा विभागीय अनुमति की निष्पक्ष जांच किए जाने की मांग उठ रही है।
दूसरी ओर, वन विभाग द्वारा वनभूमि से जुड़े मामलों में आम नागरिकों के विरुद्ध कार्रवाई किए जाने की स्थिति में यह सवाल भी उठता है कि क्या शासकीय सेवा में पदस्थ अधिकारियों एवं कर्मचारियों के संपत्ति संबंधी मामलों की भी उसी गंभीरता से जांच होती है।
यदि आरोप सही पाए जाते हैं तो यह विभागीय नियमों के पालन और प्रशासनिक जवाबदेही से जुड़ा गंभीर विषय होगा। वहीं यदि आरोप तथ्यहीन पाए जाते हैं तो संबंधित अधिकारी को भी जांच के माध्यम से अपना पक्ष स्पष्ट करने का अवसर मिलना चाहिए।
अधिकारी ने आरोपों को बताया बेबुनियाद
इस मामले में संबंधित उप वन मंडलाधिकारी से दूरभाष के माध्यम से पक्ष जानने का प्रयास किया गया। अधिकारी ने लगाए गए आरोपों को बेबुनियाद बताया। हालांकि, उपलब्ध बताए जा रहे दस्तावेजों और अभिलेखों की स्वतंत्र रूप से जांच होना अभी बाकी है।
अब जांच पर टिकी नजर
मामले में मुख्य सवाल यही है कि संबंधित भूमि का वास्तविक स्वरूप क्या था, उसका पंजीयन किस आधार पर हुआ, किसके नाम पर कब-कब हस्तांतरण हुआ और क्या संबंधित अधिकारी ने नियमानुसार विभाग को इसकी जानकारी अथवा अनुमति दी थी।
इन सवालों का जवाब राजस्व रिकॉर्ड, पंजीयन दस्तावेज और विभागीय अभिलेखों की निष्पक्ष जांच से ही सामने आ सकता है।
आगे भी इस मामले से जुड़े दस्तावेजों और विभागीय कार्यप्रणाली पर आधारित रिपोर्ट प्रकाशित की जाएगी।

पार्ट 3 में और कई तथ्य और कई विषयों के साथ खबर प्रकाशन किया जाएगा

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